छत्तीसगढ़दुर्ग संभागबस्तर संभागबिलासपुर संभागरायपुर संभागसरगुजा संभाग

ना ज़हर, ना खर्च ज्यादा! छत्तीसगढ़ में किसानों की पहली पसंद बन रहा ‘अग्निअस्त्र’ घोल

छत्तीसगढ़ में धान व सब्जी फसलों को कीट-रोगों से बचाने के लिए ‘अग्निअस्त्र’ जैविक घोल किसानों के लिए कारगर उपाय बन रहा है. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के वैज्ञानिक डॉ. सुनील अग्रवाल के अनुसार यह नीम पत्ती, हरी मिर्च, लहसुन और गौमूत्र से तैयार होता है. यह सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशक है.

छत्तीसगढ़ में इन दिनों धान और सब्जियों की खेती अपने चरम पर है. रबी और खरीफ सीजन के बीच किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीट और फफूंद जनित रोगों से फसलों की सुरक्षा करना होता है. रासायनिक कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से जहां खेती की लागत बढ़ रही है, वहीं मिट्टी, पानी और स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है. ऐसे समय में प्राकृतिक और कम लागत वाले उपाय किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आ रहे हैं. इसी कड़ी में ‘अग्निअस्त्र’ नामक जैविक घोल किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जा रहा है

सब्जियों की खेती में भी बेहद प्रभावशाली
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के एग्रोनॉमी विभाग के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल ने बताया कि अग्निअस्त्र एक पूरी तरह नेचुरल तरीके से तैयार किया जाने वाला कीटनाशक और फफूंदनाशक है. इसका उपयोग धान के साथ – साथ सब्जियों की खेती में भी बेहद प्रभावशाली साबित हो रहा है. खास बात यह है कि किसान इसे अपने घर पर ही बहुत आसानी से तैयार कर सकते हैं, जिससे उन्हें बाजार से महंगे कीटनाशक खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती
तंबाकू का उपयोग बिल्कुल नहीं
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, अग्निअस्त्र बनाने के लिए 2 से 5 किलो नीम की पत्ती, आधा किलो हरी मिर्च और आधा किलो लहसुन की आवश्यकता होती है. कुछ किसान इसमें तंबाकू की पत्ती का भी उपयोग करते हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि जो किसान जैविक खेती के लिए पंजीकृत हैं, उन्हें तंबाकू का उपयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए. जैविक मानकों का पालन करना ऐसे किसानों के लिए अनिवार्य है.
अग्निअस्त्र तैयार करने की विधि बताते हुए उन्होंने कहा कि इन सभी सामग्रियों को 20 लीटर गौमूत्र में अच्छी तरह पीस लेना चाहिए. इसके बाद इस मिश्रण को करीब आधे घंटे तक उबाला जाता है, ताकि इसकी मात्रा घटकर आधी रह जाए. उबालने के बाद इसे ठंडा कर दो दिनों तक ढककर छोड़ दिया जाता है. इसके बाद घोल को अच्छी तरह छान लिया जाता है और उपयोग के समय पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाता है.
छिड़काव की मात्रा के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. अग्रवाल ने बताया कि 15 से 16 लीटर क्षमता वाले एक स्प्रेयर में लगभग 300 से 400 एमएल अग्निअस्त्र मिलाना चाहिए. प्रति एकड़ खेत में 8 से 10 स्प्रेयर का छिड़काव पर्याप्त होता है. यह घोल खासकर चबाने वाले कीट, इल्लियां और अन्य हानिकारक कीड़ों के नियंत्रण में काफी प्रभावी साबित हुआ है.
धान की फसल में तना छेदक, पत्ती लपेटक और इल्लियों जैसी समस्याओं से निपटने में अग्निअस्त्र कारगर है, वहीं सब्जियों में भी यह कीट प्रबंधन का सस्ता और सुरक्षित विकल्प बन रहा है. वैज्ञानिकों और किसानों का मानना है कि अगर किसान इस तरह के प्राकृतिक उपायों को अपनाएं, तो खेती की लागत घटेगी, उत्पादन सुरक्षित रहेगा और पर्यावरण भी संतुलित बना रहेगा.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!