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एक मशीन, हजारों छात्र…गाजीपुर पीजी कॉलेज में बायोमेट्रिक मशीन बनी परेशानी का सबब, पढ़ाई हुई चौपट

गाजीपुर के पीजी कॉलेज में बायोमेट्रिक व्यवस्था छात्रों के लिए बड़ी परेशानी बन गई है.

स्कॉलरशिप और एडमिशन के लिए हजारों छात्र एक ही मशीन पर निर्भर हैं. घंटों लाइन में खड़े रहने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है. जिम्मेदारी को लेकर कॉलेज और समाज कल्याण विभाग एक-दूसरे पर टालमटोल कर रहे हैं

गाजीपुर के पीजी कॉलेज में इन दिनों पढ़ाई हाशिये पर चली गई है और बायोमेट्रिक प्रक्रिया छात्रों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गई है. स्कॉलरशिप और एडमिशन के नाम पर रोज हजारों छात्र कॉलेज पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके लिए सिर्फ एक ही L1 बायोमेट्रिक मशीन उपलब्ध है. हालात ऐसे हैं कि छात्र सुबह कॉलेज पहुंचते हैं और शाम तक लाइन में खड़े रहते हैं. मशीन कभी काम करती है तो कभी फेल हो जाती है. कई छात्रों का बायोमेट्रिक लग ही नहीं रहा, जबकि कई बार डेटा दिखने के बावजूद सिस्टम उसे रिजेक्ट कर देता है, जिससे छात्रों को दोबारा लाइन में लगना पड़ता है.
छात्रा सीमा राजभर बताती हैं कि वह सुबह 11 बजे यह सोचकर कॉलेज आई थीं कि जल्दी काम हो जाएगा, लेकिन तीन घंटे से ज्यादा समय लाइन में खड़े रहना पड़ा. मशीन की खराबी के चलते उनका पूरा दिन खराब हो गया और पढ़ाई भी प्रभावित हुई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कॉलेज में छात्रों की संख्या हजारों में है, तो बायोमेट्रिक के लिए केवल एक ही मशीन क्यों लगाई गई. इस सवाल पर समाज कल्याण विभाग स्पष्ट जवाब देने से बचता नजर आ रहा है.
विभाग के अधिकारी राम नगीना यादव का कहना है कि बायोमेट्रिक की प्रक्रिया उनकी ओर से संचालित नहीं होती और मशीन उपलब्ध कराना कॉलेज की जिम्मेदारी है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेज मांग करे तो मशीनें बढ़ाई जा सकती हैं.
  • दूसरी ओर कॉलेज प्रशासन का कहना है कि यदि समाज कल्याण विभाग अतिरिक्त बायोमेट्रिक डिवाइस उपलब्ध करा दे, तो व्यवस्था आसानी से सुधारी जा सकती है. ऐसे में विभाग और कॉलेज के बीच जिम्मेदारी को लेकर असमंजस बना हुआ है.
इस पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा परेशानी छात्रों को उठानी पड़ रही है. पढ़ाई की जगह वे घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं. कई छात्रों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो स्कॉलरशिप से पहले उनकी पढ़ाई ही छूट जाएगी.
यह मामला सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है, जहां जिम्मेदारी सबकी होती है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं. जब तक समाज कल्याण विभाग और कॉलेज प्रशासन मिलकर ठोस कदम नहीं उठाते, तब तक छात्रों की यह परेशानी यूं ही बनी रहेगी.

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